Monday, April 23

तिथि (Thithi)

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एक तिथि अर्थात् चन्द्र और सूर्यं के मध्य बारह अंश का कोणीय अन्तर होने में लगने वाला समय । क्लिरि भी तिथि के पूरी होने में लगने क्ला समय सदैव बदलता रहता है । वह कम से कम २० घण्टों का और’ अधिक से अधिक २७ घण्टों का हो सकता है जब सूर्य और चन्द्र के समय का कोणीय अन्तर शून्य अंश का होता है, तब अमावास्या की तिथि बनती है । अमावग्ला शब्द (अमा) साथ (क्त) रहना की सन्धि होने से बना हुआ है । इसका अर्थ है, ‘साथ में क्सना अर्थात् रहना’ । जिस दिन सूर्यं और चन्द्र साथ साथ आकाश में चलत्ते हैं, उस दिन को अमाक्ला वम्हते हैं उसके बाद १२० के अन्ता तक एकम, २४० के अन्तर तक द्वितीया, ३६० के अन्तर तक तृतीया । इसी प्रकार क्रमश: होते होते १६८० से १८०० अन्तर तक पूर्णिमा अथवा पूनम (पन्द्रहवीं तिथि) बनती है । इन पन्द्रह तिथियों के पक्ष को सुद पक्ष अथवा शुक्ल पक्ष वम्हते हैं । १८० के बाद बारह बारह अंश के अन्तर से फिर से प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया के बाद चौदहवीं तिथि (चतुर्दशी) बनने के बाद ३४८० से ३६०० के अन्तर तक अमावास्या तिथि बनती है । वास्तव में ३६०० तक का अन्तर होने पर एकम से अमाक्ला तक की पन्द्रह तिथियों के पक्ष को वद पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष कहते हैं चन्द्रमा की कुल सोलह कलाएँ होती हैं । उनमें से एक क्ला हमेशा खुली रहती है । अमावास्या के समय में चन्द्रमा की १५ वल्लाएँ ढ़की हूई रहती है । शुक्ल पक्ष में एक एक तिथि में चनद्गमा की एक एक कला खुलती जाती है ।सूर्योदय के साथ एक तिथि प्रारम्भ होती है और दूसरे दिन सूर्योदय के साथ दूसरी तिथि प्रारम्भ हो जाती है, ऐसा नहीं होता कोई भी तिथि दिन में या रात्रि में किसी भी समय प्रारम्भ हो सक्खी है । तथा किसी भी समय पूरी भी हो सकती है । इसलिए चन्द्रमा हमेशा रात कॉ ही आकाश में दिखाई देता है, ऐसा कोई नियम नहीँ है । मुख्य रूप से पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा आकाश में होता है और अमावक्या के दिन चन्द्रमा सूर्य के साथ साथ चलता रहने से चन्द्रमा की एक क्ला खुली होते हुए भी सूर्य के निक्ट होने से सूर्यं दृक्रे तेज के कारण दिन में दिखाई नहीं देता । ओंर अमावख्या की रात्रि में चन्द्रमा आकाश में होता ही नहीं शुक्ल” पक्ष की अष्टमी से त्रयोदशी के दिनों में शाम को चार बजे से सूर्यास्त तक की अवधि में पूर्व दिशा के आकाश में और कृष्ण पक्ष क्री” तिथियों के दिनो” में सूर्योदय से प्रात: ६ बजे तक आप चन्द्रमा को पश्चिम दिशा में आकाश में देख सक़त्ते हैं शुक्ल पक्ष क्री अष्टमी को चन्द्रमा अत्काश में लगभग मध्य रात्रि तक दिखाई देता है । मध्यरात्रि को चन्दास्त होने से वह मध्य रात्रि के बाद आकाश में नहीं दीखता । इसके विपरीत कृष्ण पक्ष क्री अष्टमी को चन्द्रमा आकाश में लगभग मध्यरात्रि तक नहीं दीखता और मध्य रात्रि के बाद चन्दोदय होता है और चन्द्रमा लगभग सिर केऊपर आता है तब तक” सूर्योदय हो जस्ता है ।

तिथि विवरण

1 प्रतिपदा तिथि- यह वृद्धि और सिद्धप्रद तिथि है। स्वामी अग्नि देवता, नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ। इस तिथि में कूष्माण्ड दान एवं भक्षण त्याज्य है।

2 द्वितीया- यह सुमंगला और कार्य सिद्धिकारी तिथि है। इसके स्वामी ब्रह्मा हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में कटेरी फल का दान और भक्षण त्याज्य है।

3 तृतीया तिथि- यह सबला और आरोग्यकारी तिथि है। इसकी स्वामी गौरी जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में नमक का दान व भक्षण त्याज्य है।

4 चतुर्थी तिथि- यह खल और हानिप्रद तिथि है। इसके स्वामी गणेश जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में तिल का दान और भक्षण त्याज्य है।

5 पंचमी तिथि- यह धनप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी नागराज वासुकी हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ और कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में खट्टी वस्तुओं का दान और भक्षण त्याज्य है।

6 षष्ठी तिथि- कीर्तिप्रद तिथि है। इसके स्वामी स्कंद भगवान हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण पक्ष में मध्यम फलदायी, तैल कर्म त्याज्य।

7 सप्तमी तिथि- मित्रप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी भगवान सूर्य हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, आंवला त्याज्य।

8 अष्टमी तिथि- बलवती व व्याधि नाशक तिथि है। इसके देवता शिव जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, नारियल त्याज्य।

9 नवमी तिथि- उग्र व कष्टकारी तिथि है। इसकी देवता दुर्गा जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, काशीफल (कोहड़ा, कद्दू) त्याज्य।

10 दशमी तिथि- धर्मिणी और धनदायक तिथि है। इसके देवता यम हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, त्याज्य कर्म परवल है।

11 एकादशी तिथि- आनंद प्रदायिनी और शुभ फलदायी तिथि है। इसके देवता विश्व देव हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म दाल है।

12 द्वादशी तिथि- यह यशोबली और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता हरि हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मसूर है।

13 त्रयोदशी तिथि- यह जयकारी और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता मदन (कामदेव) हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म बैंगन है।

14 चतुर्दशी तिथि- क्रूरा और उग्रा तिथि है। इसके देवता शिवजी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मधु है।

15 पूर्णिमा तिथि- यह सौम्य और पुष्टिदा तिथि है। इसके देवता चंद्रमा हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में पूर्ण शुभ, त्याज्य कर्म घृत है।

16 अमावस्या तिथि- पीड़ाकारक और अशुभ तिथि है। इसके स्वामी पितृगण हैं। फल अशुभ है, त्याज्य कर्म मैथुन है।

संकलन : आशीष त्यागी व  गौरव आर्य 

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