Thursday, July 19

Guru Shishya Katha

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Guru Shishya Katha

चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्या

चाणक्य को एक योग्य शिष्य की तलाश थी , उनको घनानंद के दुशाशन का अन्त करना था .खोज में उनका परिचय चंद्रगुप्त से हुआ . चाणक्य उसकी चतुराई पर बहुत चकित थे . चंद्रगुप्त को चाणक्य ने अपना शिष्य स्वीकार कर लिया . चंद्रगुप्त के माता पिता से चाणक्य ने चंद्रगुप्त को तक्षयशील भेजने का प्रस्ताव रखा . स्वीकृति मिलने पर वह चंद्रगुप्त को तक्षयशील ले गए . अपने निर्देशन में चाणक्य ने चंद्रगुप्त को अस्त्र सस्त्र की शिक्षा दी . अपने गुरु की खोज और शिक्षा को सफल करने के लिए चंद्रगुप्त ने बहुत मेहनत की . सुयोग्य गुरु पाकर चंद्रगुप्त   ने सफलता  की सीढ़ियां चढ़नी शुरू कर दी .धीरे धीरे चंद्रगुप्त   सम्पूर्ण भारत का  सम्राट  बन गया . चंद्रगुप्त ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र बनायीं . राजगद्दी पर बैठने का समारोह बनाया जाने को था लेकिन गुरु चाणक्य  ने इसका विरोध किया . चंद्रगुप्त के मन में अपने गुरु के इस विरोध को लेकर शंका तो हुई पर उसे भ्रम भी बना रहा . बाद में समारोह न मनवाने का कारण भी साफ़ हो गया . इस समारोह में पराजित घनानंद के स्वामिभक्त मंत्री ने अंतिम प्रयास किया जिससे हारा हुआ राज्य फिर से प्राप्त किया जा सके .चाणक्य  ने इस षड्यन्द्र का भंडाफोड़ कर दिया . तब चंद्रगुप्त ने समझ की उसका विरोध गुरुदेव क्यों कर रहे थे . इससे चंद्रगुप्त के मन में गुरु चाणक्य के प्रति विश्वास और बढ़ गया .चंद्रगुप्त को राजा मानाने वाले चाणक्य हमेशा राज्य से दूर रहते वह नगर से दूर कुटिया बनाकर रहते . उन्होंने सतर्कता पूर्वक राज्य को सुरक्षा प्रदान की और लोक कल्याण किया .चाणक्य  ने चाणक्य नीति  द्वारा एक साधारण से बालक को पुरे भारत का राजा बना दिया .

एकलव्य की गुरुदक्षिणा की कहानी

महाभारत काल में एकलव्य नाम का बहादुर लड़का था जिसके पिता हिरण्यधनु हमेसा एकलव्य को जीवन में आगे बढने की सलाह दिया करते थे और कहते थे की यदि परिश्रम करोगे तो निश्चित इस दुनिया में सर्वश्रेष्ठ स्थान पा सकते हो, अपने पिता की बातो को मानकर एकलव्य धनुष विद्या सिखने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया लेकिन द्रोणाचार्य ने धनुष विद्या सिखाने से साफ़ मना कर दिया जिसके पश्चात एकलव्य दुखी मन से अपने पिता के पास आया और सब बात बता दियातो एकलव्य की बाते सुनकर एकलव्य के पिता ने कहा की हमे भगवान मिलते है क्या, लोग मूर्ति बनाकर ही पूजा करते है तुम भी अपने गुरु की मूर्ति बनाकर अपनी धनुष विद्या शुरू करो और इसके पश्चात अपने पिताजी के कहे अनुसार धनुष विद्या प्रारम्भ कर दिया अपने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति से प्रेरणा से लेकर मन में एकाग्रता के साथ एकलव्य धनुष विद्या सिखने लगा और फिर ऐसे एकलव्य धनुष विद्या में आगे बढने लगाएक बार की बात है इसी दौरान गुरु द्रोणाचार्य अपने पांड्वो और कौरवो शिष्यों के साथ जंगल में गुजर रहे थे की अचानक कुत्ते की आवाज सुनकर उसी वन में स्थित एकलव्य ने आवाज को निशाना बनाकर बाण छोड़ दिया जो सीधा बाण से कुत्ते का मुह भर गययह सब देखकर गुरु द्रोणाचार्य बहुत ही आश्चर्यचकित हुए और वे एकलव्य के पास पहुचे और बोले तुमने यह सब कैसे कर लिया तो एकलव्य ने अपनी सारी बात बता दी और बता दिया की आपको हमने अपना गुरु मान लिया हैयह सब बाते सुनकर गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन याद आ गया और फिर एकलव्य से कहा की “तुमने तो मुझे अपना गुरु तो मान लिया लेकिन गुरु दक्षिणा कौन देंगा” यह बाते सुनकर एकलव्य ने कहा “जो आपको चाहिए वो बता दे मै अवश्य ही आपको गुरुदक्षिणा दूंगा”यह बात सुनकर गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से दाए हाथ का अंगूठा मांग लिया, इसके बाद एकलव्य ने एक पल बिना विचार करते हुए अपने गुरु के चरणों में अपना अंगूठा काटकर अर्पण कर दिया और इस प्रकार एकलव्य फिर कभी बाण नही चला सकता थालेकिन धन्य है ऐसी गुरुभक्ति जिसके चलते एकलव्य हमेसा के लिए अपने त्याग और बलिदान से अमर हो गया|

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