Friday, July 20

भैरवीकवचम् श्रीदेव्युवाच (Bhairavi Kavcham)

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भैरवीकवचम् श्रीदेव्युवाच

भैरव्या: सकला विद्या: श्रुताश्चधिगता मया। साम्प्रतं श्रोतुमिछ्छामि कवचं यत्पुरोदितम् ।।१।।

त्रैलोक्यविजयं नाम शस्त्रास्त्रविनिवारकम् । त्वत्त: परतरो नाथ क: कृपां कर्तुमर्हति ।।२।।

पूर्वपीठिका- श्रीदेवी ने कहा कि हे नाथ! मैं भैरवी देवी की सभी विद्याओं को पहले सुन और समझ चुकी हूँ। अब मैं पूर्वकथित कवच को सुनना चाहती हूँ। हे नाथ! यह त्रैलोक्यविजय नामक कवच शस्त्रास्त्रों का निवारण करता है। आपसे अधिक श्रेष्ठ कौन है, जो कृपा कर यह बतला सकता है

।।१-२।। ईश्वर उवाच- श्रृणु पार्वती वक्ष्यामि सुन्दरि प्राणवल्लभे । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं मन्त्रविग्रहम् ।।३।।

पठित्वा धारयित्वेदं त्रैलोक्यविजयी भवेत्। जघान सकलान् दैत्यान् यद्धत्वामधुसूदन: ।।४।।

ब्रह्मा सृष्टिं वितनुते यद्धत्वाभीष्टदायक: । धनाधिप: कुबेरोऽपि वासवस्त्रिदशेश्वर: ।।५।।

ईश्वर ने कहा कि हे पार्वता! प्राणप्रिये! सुन्दरि!सुनो। मैं त्रैलोक्यविजय नामक कवच को कहता हूँ। इसके पाठ और धारण करने से साधक तीनों लोकों में विजयी होता है। इस कवच को धारण करके मधुनाशक विष्णु ने सभी दैत्यों को मार डाला थी। इस अभीष्टप्रद कवच को धारण कर ब्रह्मा सृष्टि करते हैं। इसी कवच के प्रभाव से कुवेर धनेश हैं। इन्द्र देवताओं के स्वामी हैं।।३-५।। तीनों लोको को जीतने वाला मैं प्रभु ईश्वर हूँ। दूसरे के शिष्यों को, साधना न करने वालों को और यदि अपना पुत्र भी साधक नहीं है तो उसे भी यह कवच कदापि नहीं देना चाहिये। अनधिकारी को इसे देने से दाता की मृत्यु होती है।

विनियोग-

इस भैरवी कवच के ऋषि दक्षिणामूर्ति, छन्द विराट् और देवता जग-द्धात्री बाला भैरवी हैं। चतुर्वर्ग-सिद्धि के लिये इसका विनियाग होता है। कवच- अधर ऐ, उसमें अनुस्वार जोड़ने से पहला बीज ऐं बनता है, काम क में शक्र ल जोड़कर उसमें ई और राशिबिन्दु जोड़ने से दूसरा बीज क्लीं बनता है।भृगु स में मनु स्वर औ और विसर्ग जोड़ने से तीसरा बीज सौ: होता है। इस प्रकार तीन बीजों वाला बालामन्त्र ऐं क्लीं सौ: मेरे शिर की रक्षा करे। बिन्दु-नाद से युक्त और विसर्ग से रहित वह कुमारी ऐं क्लीं सौ: मेरे मस्तक तथा दोनों नेत्रों की और वाग्बीज ऐं दोनों कानों की रक्षा करे। कामबीज क्लीं सर्वदा मेरे दोनों नथुनों की रक्षा करे। ज्ञानदायनी सरस्वती पवित्र प्रकाशवती सर्वदा मेरी जीभ की रक्षा करे। हसैं कण्ठ की हसकलरीं दोनों कन्धों की और हसौ: दोनों भुजाओं की रक्षा करे। पञ्चमी भैरवी हस्त्रैं मेरे दोनों हाथों की रक्षा सर्वदा करे। ह्रदय की रक्षा हसकलरीं, वक्ष और दोनों स्तनों की रक्षा हस्त्रौ: करे। चैतन्यास्वरूपा भैरवी इस प्रकार मेरी रक्षा करें। हस्त्रैं मेरे दोनों पार्श्वों की रक्षा सर्वदा करे। हसकलरीं कुक्षि की और हसौ: कमर की रक्षा करे। पृथ्वी पर भैरवी को प्राप्त करना कठिन है। बीजविद्या ऐं ईं ॐ मेरे मध्य शरीर की सदैव रक्षा करे। हसै: पीठ की और हसकलरीं नाभि की रक्षा करे। हसौ: कटि की रक्षा करे, षट्कूटा भैरवी इस प्रकार मेरी रक्षा करे। हसरैं दोनों ऊरुओं की, हसकलरीं गुह्य देश की और हसौ: मेरे दोनों जानुओं की रक्षा करे। सम्पत् प्रदा भैरवी इस प्रकार मेरी रक्षा करे। हसैं दोनों जाघों की और हसरीं पैरों की रक्षा करे। हसौ: सारे शरीर की रक्षा करे। इस प्रकार भैरवी मेरी रक्षा सर्वदा करे। हसैं मेरी रक्षा पूर्व दिशा में और हसकलरों आग्नेय कोण में रक्षा करे। हसौ: दक्षिण दिशा में रक्षा करे। भैरवी चक्र में अधिष्ठता भैरवी मेरी रक्षा करे। ह्रीं क्लीं ब्लूं चक्रभैरवी सर्वदा नैर्ऋत्य कोण में मेरी रक्षा करे। हसैं हसकलह्रीं हस्त्रौ: भैरवी मेरी रक्षा पश्चिम दिशा मे; क्रीं क्रीं क्रीं वायव्य कोँ में और हूं हूं मेरी रक्षा उत्तर दिशा में करे। ह्रीं ह्रीं सर्वदा ईशान कोण में मेरी रक्षा करे और दक्षिणे कालिके ऊर्ध्व दिशा में रक्षा करे। सभी बीज मेरी रक्षा अधोदिशा में करें। दिशा-विदिशाओं में खड्गधारिणी कालिका-रूपा स्वाहा मेरी रक्षा करे।

“ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट् स्वरूपा तारा मेरी रक्षा सर्वदा सर्वत्र करे।”

युद्ध में, वन में, दुर्ग में, लहरों के कारणहन्ता जल में, खड्ग और कैंचीधारिणी उग्रतारा सर्वदा मेरी रक्षा करें। हे देवि! यह तत्त्व से भी अधिक बड़े तत्त्व वाला विलक्षण त्रैलोक्यविजय नामक कवच मैंने तुझसे कहा। फलश्रुति- जो शुद्ध भाव से इसका पाठ करेगा, वह पूजा का फल प्राप्त करेगा। लक्ष्मी और सरस्वती परस्पर स्पर्द्धा त्याग कर उसके घर में निवास करेंगी। जो शत्रुओं से भयभीत हो, जो युद्धभय से भीत हो या वन अथवा सागर से डर रहा हो, सभा में प्रतिवादियों के वाद-विवाद से, राजा के क्रोध या प्रबल प्रतिकूलता से या प्रबल तूफान से या शयन से डरा हुआ हो, गुरु के अलंघ्य क्रोध से डरा हो, वह देवी की पूजा करके इस कवच का पाठ तीनों सन्ध्याओं में करे। ऐसा करने वह सभी भयों से मुक्त होकर विजयी होता है और भगवान् शंकर के समान तेजस्वी होता है। मेरे मुख से कथित इस त्रैलोक्यविजय नामक कवच को भाजपत्र पर लिखकर गुटिका बनाकर सोने की ताबीज में भरकर यदि कण्ठ अथवा दाँईं भुजा में धारण करे तो तीनों लोको में विजयी होता है। उसके शरीर में लगने वाले शस्त्र फूल बन जाते हैं। उसके घर में लक्ष्मी और सरस्वती सुखपूर्वक रहती हैं। इस कवच को जाने विना जो परम भैरवी या बाला के मन्त्र का जप करता है, वह दरिद्र होकर मृत्यु को प्राप्त करता है।

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